Love Shayari In Hindi

मिस्ल-ए-मजनूँ जो परेशाँ है बयाबान में आज

क्यूँ दिला कौन समाया है तिरे ध्यान में आज

जुरअत क़लंदर बख़्श
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समझ में आए तो समझो कभी हमारा दुख

फिर उस के बाद हमारे हुओं का दुख समझो

शिवेंद्र सिंह
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मेरे ता'वीज़ में जो काग़ज़ है

उस पे लिक्खा है मोहब्बत करना

स्वप्निल तिवारी
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तेरे आने की जब ख़बर महके

तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके

नवाज़ देवबंदी
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ऐ दिल तमाम नफ़अ' है सौदा-ए-इश्क़ में

इक जान का ज़ियाँ है सो ऐसा ज़ियाँ नहीं

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
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दिल की धड़कन को सुना ग़ौर से कल रात 'अदील'

जिस को मैं ढूँढता रहता हूँ बसा है मुझ में

अदील ज़ैदी
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मोहब्बत का उन को यक़ीं आ चला है

हक़ीक़त बने जा रहे हैं फ़साने

महेश चंद्र नक़्श
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मिरी जानिब न अब बढ़ना मोहब्बत

मैं अब पहले से मुश्किल रास्ता हूँ

लियाक़त अली आसिम
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'क़तील' अब दिल की धड़कन बन गई है चाप क़दमों की

कोई मेरी तरफ़ आता हुआ महसूस होता है

क़तील शिफ़ाई
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दिल थाम के करवट पे लिए जाऊँ हूँ करवट

वो आग लगी है कि बुझाए न बने है

कलीम आजिज़
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मिरे पहलू में वो आया भी तो ख़ुश्बू की तरह

मैं उसे जितना समेटूँ वो बिखरता जाए

अज्ञात
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इस तरह निगाहें मत फेरो, ऐसा न हो धड़कन रुक जाए

सीने में कोई पत्थर तो नहीं एहसास का मारा, दिल ही तो है

साहिर लुधियानवी
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मज़ा जब था कि मेरे मुँह से सुनते दास्ताँ मेरी

कहाँ से लाएगा क़ासिद दहन मेरा ज़बाँ मेरी

अज्ञात
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वो इत्तिफ़ाक़ से नज़दीक आए हैं लेकिन

ये इत्तिफ़ाक़ हुआ है बड़ी दुआओं के बा'द

अज्ञात
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जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

पराई आग में क्यूँ उँगलियाँ जलाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद
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मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है

तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं

फ़रहत एहसास
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मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब

दो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो

अमीर मीनाई
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बस एक ही बला है मोहब्बत कहें जिसे

वो पानियों में आग लगाती है आज भी

अजीत सिंह हसरत
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अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी

अब तो चलिए प्यार की बातें करें

अख़्तर शीरानी
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मैं घटता जा रहा हूँ अपने अंदर

तुम्हें इतना ज़ियादा कर लिया है

सालिम सलीम
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सीने में राज़-ए-इश्क़ छुपाया न जाएगा

ये आग वो है जिस को दबाया न जाएगा

हमीद जालंधरी
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इब्तिदा वो थी कि जीने के लिए मरता था मैं

इंतिहा ये है कि मरने की भी हसरत न रही

माहिर-उल क़ादरी
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न जाने कौन सी मंज़िल पे आ पहुँचा है प्यार अपना

न हम को ए'तिबार अपना न उन को ए'तिबार अपना

क़तील शिफ़ाई
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मोहब्बत को छुपाए लाख कोई छुप नहीं सकती

ये वो अफ़्साना है जो बे-कहे मशहूर होता है

लाला माधव राम जौहर
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कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बाद सहर न हो

बशीर बद्र
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रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें

जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

सुदर्शन फ़ाकिर
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इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद

ख़ुद-बख़ुद दिल में है इक शख़्स समाया जाता

अल्ताफ़ हुसैन हाली
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कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की

उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की

परवीन शाकिर
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मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं

कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं

जिगर मुरादाबादी
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मेरे घर के तमाम दरवाज़े

तुम से करते हैं प्यार आ जाओ

अनवर शऊर
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