Love Shayari In Hindi
मिस्ल-ए-मजनूँ जो परेशाँ है बयाबान में आज
क्यूँ दिला कौन समाया है तिरे ध्यान में आज
समझ में आए तो समझो कभी हमारा दुख
फिर उस के बाद हमारे हुओं का दुख समझो
मेरे ता'वीज़ में जो काग़ज़ है
उस पे लिक्खा है मोहब्बत करना
तेरे आने की जब ख़बर महके
तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके
ऐ दिल तमाम नफ़अ' है सौदा-ए-इश्क़ में
इक जान का ज़ियाँ है सो ऐसा ज़ियाँ नहीं
दिल की धड़कन को सुना ग़ौर से कल रात 'अदील'
जिस को मैं ढूँढता रहता हूँ बसा है मुझ में
मोहब्बत का उन को यक़ीं आ चला है
हक़ीक़त बने जा रहे हैं फ़साने
मिरी जानिब न अब बढ़ना मोहब्बत
मैं अब पहले से मुश्किल रास्ता हूँ
'क़तील' अब दिल की धड़कन बन गई है चाप क़दमों की
कोई मेरी तरफ़ आता हुआ महसूस होता है
दिल थाम के करवट पे लिए जाऊँ हूँ करवट
वो आग लगी है कि बुझाए न बने है
मिरे पहलू में वो आया भी तो ख़ुश्बू की तरह
मैं उसे जितना समेटूँ वो बिखरता जाए
इस तरह निगाहें मत फेरो, ऐसा न हो धड़कन रुक जाए
सीने में कोई पत्थर तो नहीं एहसास का मारा, दिल ही तो है
मज़ा जब था कि मेरे मुँह से सुनते दास्ताँ मेरी
कहाँ से लाएगा क़ासिद दहन मेरा ज़बाँ मेरी
वो इत्तिफ़ाक़ से नज़दीक आए हैं लेकिन
ये इत्तिफ़ाक़ हुआ है बड़ी दुआओं के बा'द
जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं
पराई आग में क्यूँ उँगलियाँ जलाऊँ मैं
मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं
मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब
दो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो
बस एक ही बला है मोहब्बत कहें जिसे
वो पानियों में आग लगाती है आज भी
अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी
अब तो चलिए प्यार की बातें करें
मैं घटता जा रहा हूँ अपने अंदर
तुम्हें इतना ज़ियादा कर लिया है
सीने में राज़-ए-इश्क़ छुपाया न जाएगा
ये आग वो है जिस को दबाया न जाएगा
इब्तिदा वो थी कि जीने के लिए मरता था मैं
इंतिहा ये है कि मरने की भी हसरत न रही
न जाने कौन सी मंज़िल पे आ पहुँचा है प्यार अपना
न हम को ए'तिबार अपना न उन को ए'तिबार अपना
मोहब्बत को छुपाए लाख कोई छुप नहीं सकती
ये वो अफ़्साना है जो बे-कहे मशहूर होता है
कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बाद सहर न हो
रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद
ख़ुद-बख़ुद दिल में है इक शख़्स समाया जाता
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की
मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं
मेरे घर के तमाम दरवाज़े
तुम से करते हैं प्यार आ जाओ